
जो मैंने कभी खुद से नहीं कहा,
कहना ज़रूर चाहती हूँ।
यूँ ही दो लफ़्ज़ों की बात को
खुद से ही दफ़ना दिया।
ख़ुद को ख़ुश समझ रही थी,
मगर दुनिया से लड़ रही थी।
दुनिया को समझाने में जो जुट गई,
खुद को कहीं छोड़ गई।
सबने पूछा—
ये चुप्पी क्यों है?
तब समझ आई,
कि मेरा समझना ही शायद ग़लत था।
लोगों को समझते-समझते
खुद को भुला गई।
जो कहना था खुद से,
वो दूसरों को कहती चली गई।
आईने में देख खुद को,
खुद से नज़र जो चुराती हूँ।
मन करता है
खुद को तसल्ली दूँ,
झूठ बोलकर।
अगर ये अनजान दिल संभलता ही नहीं,
तो कसूर किसका है—दिल का या हालात का?
–sayali